कानपुर। छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई सभागार में ‘युवा संवाद’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने की। इस दौरान विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और महिला सुरक्षा सहित विभिन्न विषयों पर सवाल किए।
भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता पर पूछे गए सवाल के जवाब में सुनील आंबेकर ने कहा कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने कहा कि संघ का मूल कार्य समाज को उसकी जड़ों और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ना है। भाषाओं, परंपराओं और पूजा-पद्धतियों में भिन्नता के बावजूद भारतीय समाज एक साझा सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराएं व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा नहीं बनतीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। युवाओं को बाइनरी सोच से बाहर निकलकर एकता, सह-अस्तित्व और सामूहिकता की भावना को समझना चाहिए। त्याग, समर्पण और सेवा जैसे मूल्य समाज को जोड़ने का काम करते हैं।
AI के दौर में विवेक की अहमियत
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोजगार को लेकर युवाओं की आशंकाओं पर आंबेकर ने कहा कि AI सूचना उपलब्ध कराने और उसे तेजी से प्रोसेस करने में सक्षम है, लेकिन सही परिस्थिति में सही निर्णय लेने का विवेक मनुष्य के पास ही है। समाज और मानव कल्याण के अनुरूप क्या निर्णय लिया जाए, यह तय करने की क्षमता मशीनों से अलग मनुष्य की विशेषता है।
उन्होंने कहा कि तकनीक का स्वरूप कैसा होगा और मनुष्य किस प्रकार का जीवन जीना चाहता है, इसका निर्णय समाज को स्वयं करना होगा। युवाओं को पहले अपनी क्षमताओं और आवश्यकताओं को समझना चाहिए, इसके बाद तकनीक का उपयोग अपने विकास के लिए करना चाहिए।
सेवा प्रकल्पों और कौशल विकास पर जोर
सुनील आंबेकर ने संघ से जुड़े विभिन्न सेवा प्रकल्पों की जानकारी देते हुए दिव्यांगजन सशक्तिकरण के लिए ‘सक्षम’, शिक्षा के क्षेत्र में ‘विद्या भारती’ तथा सुदूर क्षेत्रों में संचालित ‘एकल विद्यालय’ का उल्लेख किया। उन्होंने ‘स्वावलंबी भारत अभियान’ के माध्यम से युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित किए जाने की भी जानकारी दी।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे केवल एक डिग्री तक सीमित न रहें, बल्कि कम से कम दो-तीन नए कौशल विकसित करें। उन्होंने नई शिक्षा नीति में पाठ्येतर गतिविधियों को दिए गए महत्व का उल्लेख करते हुए शोधार्थियों और विद्यार्थियों को माध्यमिक स्रोतों के बजाय प्राथमिक एवं मूल स्रोतों का अध्ययन करने की सलाह दी।
महिला सुरक्षा के लिए मानसिकता में बदलाव जरूरी
महिला सुरक्षा के मुद्दे पर आंबेकर ने कहा कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। विश्वविद्यालय और आसपास ऐसा वातावरण विकसित किया जाना चाहिए, जहां महिलाएं सुरक्षित महसूस करें। उन्होंने कहा कि केवल कानून और नियमों से सामाजिक बदलाव संभव नहीं है। इसके लिए परिवार और समाज में सुरक्षा, सम्मान और सकारात्मक व्यवहार की संस्कृति विकसित करनी होगी।
उन्होंने बच्चों को बचपन से ऐसा वातावरण देने पर जोर दिया, जिसमें वे बिना झिझक अपनी बात रख सकें और परिवार के सदस्यों के साथ संवाद कर सकें।
लोकतंत्र में असहमति और संवाद जरूरी
लोकतंत्र में असहमति को सामान्य बताते हुए उन्होंने कहा कि विरोध हमेशा शांतिपूर्ण होना चाहिए। किसी निष्कर्ष या निर्णय तक पहुंचने के लिए संवाद और सर्वसम्मति सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत में कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने मुख्य वक्ता का स्वागत किया। उन्होंने वर्ष 1991 से संघ के साथ अपने अनुभव साझा किए और आयुर्वेद के क्षेत्र में शुरुआती दौर में पांच लोगों के साथ किए गए कार्यों तथा अपनी टीम द्वारा तैयार की गई ‘वैदिक पुस्तक’ का उल्लेख किया।
प्रो. पाठक ने विद्यार्थियों को ‘लेजर लाइट और टॉर्च’ का उदाहरण देते हुए जीवन में एकाग्रता और स्पष्ट दिशा बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने जापान प्रवास के अनुभव भी साझा किए और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियों के साथ अपने संबोधन का समापन किया।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक भवानी भीख सहित विश्वविद्यालय के बड़ी संख्या में शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
