भिलाई-दुर्ग। विश्व हिन्दू परिषद, छत्तीसगढ़ प्रांत द्वारा आयोजित परिषद शिक्षा वर्ग का समापन 15 जून को अग्रसेन भवन, भिलाई-दुर्ग में हुआ। 5 जून से शुरू हुए इस प्रशिक्षण वर्ग में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए कार्यकर्ताओं ने संगठन, सेवा, सुरक्षा, संस्कार और समाज जीवन से जुड़े विविध विषयों पर प्रशिक्षण प्राप्त किया।

वर्ग के दौरान विश्व हिन्दू परिषद मध्य क्षेत्र के क्षेत्र संगठन मंत्री जितेन्द्र पवार ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरुजी) के जीवन और कार्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संगठन कार्य केवल किसी संस्था का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सतत साधना है। डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी का जीवन त्याग, अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का प्रेरक उदाहरण है।

श्रीगुरुजी के जीवन प्रसंगों का किया उल्लेख
जितेन्द्र पवार ने श्रीगुरुजी के बाल्यकाल से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके मन में बचपन से ही मातृभूमि के प्रति गहरी श्रद्धा और संवेदनशीलता थी। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी के बीच आत्मीय संबंध इतने गहरे थे कि डॉ. आबाजी थत्ते ने एक बार कहा था कि वे डॉ. हेडगेवार के दाहिने हाथ थे, लेकिन श्रीगुरुजी उनके हृदय थे।
उन्होंने श्रीगुरुजी के उस प्रसिद्ध कथन का भी उल्लेख किया, जिसमें संगठन को “अभेद्य किला” बताते हुए उसकी दृढ़ता और शक्ति का वर्णन किया गया था।
संगठन और राष्ट्र जीवन में योगदान
अपने संबोधन में पवार ने श्रीगुरुजी के शैक्षणिक, आध्यात्मिक और संगठनात्मक जीवन की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान उनका संघ से परिचय हुआ और बाद में उन्होंने पूर्णकालिक रूप से संगठन कार्य को जीवन का उद्देश्य बना लिया।
उन्होंने बताया कि देश विभाजन, कश्मीर, गोवा मुक्ति आंदोलन और राष्ट्रीय संकट के विभिन्न कालखंडों में श्रीगुरुजी ने समाज को संगठित करने और उसका मनोबल बढ़ाने का कार्य किया। साथ ही चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर उनकी दूरदर्शिता का भी उल्लेख किया।
डॉ. हेडगेवार की तीन प्रमुख व्यवस्थाएं
जितेन्द्र पवार ने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने समाज को तीन महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं प्रदान कीं—
प्रचारक पद्धति : राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की परंपरा।
गुरुदक्षिणा व्यवस्था : संगठन की स्वावलंबी और आत्मनिर्भर आर्थिक प्रणाली।
शाखा पद्धति : व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण की अनूठी व्यवस्था।
उन्होंने कहा कि इन व्यवस्थाओं के माध्यम से संगठन ने समाज में आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा का भाव विकसित किया।
राष्ट्रसेवा को जीवन साधना बनाने का आह्वान
अपने उद्बोधन के दौरान पवार ने अनेक प्रेरक प्रसंग साझा करते हुए कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी के जीवन से प्रेरणा लेकर संगठन कार्य को राष्ट्रसेवा की साधना मानें। उन्होंने कहा कि त्याग, समर्पण, अनुशासन और संगठन शक्ति के मूल्यों को आत्मसात कर ही एक सशक्त और संगठित समाज का निर्माण किया जा सकता है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित कार्यकर्ताओं ने संगठन के उद्देश्यों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने और राष्ट्रहित में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प लिया।
