बिलासपुर। पति की मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति की उम्मीद में वर्षों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहीं दो विधवाओं को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने दोनों महिलाओं के नियुक्ति आवेदन खारिज करने वाले प्रशासनिक आदेशों को रद्द कर दिया है। साथ ही संबंधित अधिकारियों को उनकी वर्तमान शैक्षणिक योग्यता के आधार पर पात्र पद पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की योजना का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है। इसलिए पात्र आश्रित को केवल तकनीकी आधार बताकर राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
2013 में पति की मौत, 2014 में आवेदन फिर भी नहीं मिली नौकरी
रायगढ़ जिले के लैलूंगा निवासी संध्या सिदार के पति राधे लाल सिदार शिक्षक (पंचायत) के पद पर कार्यरत थे। 22 जून 2013 को सेवाकाल के दौरान उनकी मौत हो गई थी।
पति की मृत्यु के बाद संध्या ने 25 मार्च 2014 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। लेकिन अधिकारियों ने 18 जुलाई 2014 को उनका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चतुर्थ श्रेणी के भृत्य पद पर नियुक्ति को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं।
संध्या की ओर से कोर्ट में बताया गया कि राज्य सरकार 3 नवंबर 2011 को ‘शिक्षा कर्मी’ पदनाम को बदलकर ‘शिक्षक (पंचायत)’ कर चुकी थी। इसके बावजूद पुराने पदनाम के आधार पर उनका आवेदन खारिज किया गया।
दूसरी महिला ने अधिकारियों की शर्त पूरी की, फिर भी आवेदन निरस्त
दूसरा मामला जशपुर जिले के पत्थलगांव की पुष्पावती सिदार का है। उनके पति तेश्वर सिंह सिदार शिक्षक (पंचायत) थे और 6 जुलाई 2013 को सेवाकाल में उनका निधन हो गया था।
पुष्पावती ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। उस समय वह 11वीं पास थीं। अधिकारियों ने उन्हें तीन साल के भीतर 12वीं पास करने की शर्त बताई। उन्होंने अधिकारियों की इस शर्त को पूरा करते हुए 12वीं की पढ़ाई पूरी कर ली।
इसके बाद उनके सामने D.Ed/B.Ed और TET की शर्त रखी गई। पुष्पावती ने चतुर्थ श्रेणी के पद पर काम करने की इच्छा भी जताई, लेकिन इसके बावजूद 28 जून 2016 को उनका आवेदन निरस्त कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा- बार-बार शर्त बदलना उचित नहीं
मामले की सुनवाई में हाई कोर्ट ने माना कि यदि किसी आश्रित को अधिकारियों के निर्देश पर अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए कहा जाता है और वह उस शर्त को पूरा कर देता है, तो उसके बाद नई-नई शर्तें लगाकर नियुक्ति से वंचित करना उचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति को केवल तकनीकी प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे एक कल्याणकारी उद्देश्य है, जिसके तहत मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक परेशानी से बाहर निकालने का प्रयास किया जाता है।
मृत कर्मचारी के पद पर ही नौकरी देना जरूरी नहीं
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का मतलब यह नहीं है कि आश्रित को मृत कर्मचारी के समान पद पर ही नियुक्त किया जाए।
यदि आश्रित की शैक्षणिक योग्यता किसी अन्य उपलब्ध पद के लिए उपयुक्त है, तो नियमों के तहत उस पद पर नियुक्ति दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि योजना का उद्देश्य परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है।
दोनों महिलाओं के पक्ष में हाई कोर्ट का आदेश
कोर्ट ने संध्या सिदार के मामले में 18 जुलाई 2014 और पुष्पावती सिदार के मामले में 28 जून 2016 को जारी किए गए निरस्तीकरण आदेशों को रद्द कर दिया।
अदालत ने संबंधित जिला पंचायत, जनपद पंचायत और अधिकारियों को निर्देश दिया कि दोनों महिलाओं की वर्तमान शैक्षणिक योग्यता और पात्रता के आधार पर उचित पद पर अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी की जाए।
इस फैसले के बाद वर्षों से अनुकंपा नियुक्ति के लिए संघर्ष कर रहीं दोनों महिलाओं के लिए सरकारी नौकरी का रास्ता साफ हो गया है। हाई कोर्ट के इस आदेश ने यह भी स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में केवल तकनीकी आधारों का सहारा लेकर पात्र आश्रित को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
