बिलासपुर। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) भर्ती में कथित अनियमितता के मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है. रायगढ़ निवासी अली हसन की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग के सचिव और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को मामले की जांच कर 120 दिनों के भीतर कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है.
क्या है पूरा मामला?
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने वर्ष 2019 में सहायक प्राध्यापक (राजनीति शास्त्र) के 59 पदों पर भर्ती निकाली थी. वर्ष 2021 में जारी अंतिम चयन सूची में अली हसन अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में प्रथम स्थान पर रहे.
अली हसन का आरोप है कि मुख्य चयन सूची में शामिल रंजन तिवारी पहले से ही हरियाणा सरकार के उच्च शिक्षा निदेशालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत थे. सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी में सामने आया कि रंजन तिवारी 13 फरवरी 2020 से हरियाणा के शासकीय महाविद्यालय, महेंद्रगढ़ में सहायक प्राध्यापक के रूप में सेवाएं दे रहे थे.
NOC नहीं देने का आरोप
याचिका में कहा गया कि CGPSC के विज्ञापन की कंडिका-4 के अनुसार यदि कोई अभ्यर्थी किसी शासकीय, अर्द्धशासकीय विभाग या निकाय में कार्यरत है, तो उसे नियुक्ति के समय अपने नियोक्ता का अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्रस्तुत करना अनिवार्य है. अली हसन ने भाटापारा शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से आरटीआई के जरिए जानकारी मांगी. कॉलेज प्रशासन ने जवाब दिया कि 23 मई 2022 को कार्यभार ग्रहण करने वाले रंजन तिवारी ने कार्यालय में अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया था.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की अंतिम सुनवाई 2 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ में हुई. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने दलील दी कि चयनित अभ्यर्थी ने भर्ती विज्ञापन की अनिवार्य शर्तों का पालन नहीं किया.
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने माना कि रंजन तिवारी के खिलाफ नियुक्ति के समय अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं करने का आरोप लगाया गया है, जिसकी जांच आवश्यक है. कोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग के सचिव और सीजीपीएससी को निर्देश दिया कि वे मामले की जांच कर आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से 120 दिनों के भीतर विधि के अनुसार उचित निर्णय लें.
