रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में मानसून सत्र के दूसरे दिन संस्कृति और पुरातत्व के संरक्षण का मुद्दा उठा. ध्यानाकर्षण में भाजपा विधायक अजय चंद्राकर और धर्मजीत सिंह ने इस मुद्दे पर ध्यानाकृष्ट कराया.
अजय चंद्राकर ने कहा कि इस मुद्दे पर विभाग की गम्भीरता दिखाई नहीं देती. राज्य के गठन के 26 साल बीत जाने के बाद भी ऐसा अभिलेखागार नहीं बन पाया है, जहां समृद्ध छत्तीसगढ़ का इतिहास एक स्थान पर मिल सके. उन्होंने यह भी कहा कि राज्य के प्राचीन पुरातत्व धरोहरों का संरक्षण भी नहीं हो पा रहा है.
उन्होंने कहा कि सिरपुर, भोरमदेव, राजिम, बारसूर जैसे अनेक स्थान अपनी स्थापत्यकला के लिए प्रसिद्ध है. ऐसे ही कई और स्थान हैं जिनका इतिहास कई शताब्दियों पूर्व के हैं. लेकिन इन स्थानों से प्राप्त मूर्तियों या अवशेषों का कोई विस्तारित दस्तावेज नहीं मिलते. प्राचीन धरोहरों से जुड़े हुए रिकॉर्ड न तो दुरस्त है और इन संरक्षण का कोई काम दिखता है.
राज्य का सबसे बड़ा और एक मात्र ऐतिहासिक संग्रहालय है, जिसकी स्थापना 1875 में रायपुर में निजी सहयोग से की गई थी. इसी संग्रहालय में सिरपुर से प्राप्त 7वीं शताव्दी की प्राचीन अवलोकितेश्वर की मूर्ति रखी गई थी. इस मूर्ति की कीमत 19 करोड़ रुपये तक आंकी गई है. यह मूर्ति 80 के दशक में चोरी हो गई थी.
अब इसे लेकर यह जानकारी सामने आई है कि यह मूर्ति अमेरिका में मिल गई है. प्राचीन वस्तुओं की तस्करी करने वाले नेटवर्क के पास यह मूर्ति बरामद की गई है और इसे भारत सरकार को लौटाया जा रहा है.
इसी को लेकर यह भी जानकारी सामने आई है कि महंत घासीदास संग्रहालय में रखे गए रजिस्टर में मूर्ति के बारे में विस्तार से जानकारी थी, लेकिन रजिस्टर को दीमक खा गए. इस स्थिति में मूर्ति को लेकर कोई प्रमाण पुरातत्व विभाग पेश नहीं कर पाया है. परिमाण स्वरूप मूर्ति अब वापस नहीं ला जा सकी है.
इससे आंदजा लगाया जा सकता है कि राज्य के धरोहर को लेकर किस स्तर की लापरवाही बरती जा रही है. इसे यह भी प्रतीत होता है कि ऐसी और कितनी प्राचीन वस्तुओं को लेकर लापरवाही बरती गई होगी. किसी अभिलेखागार या संग्रहालय के लिए रजिस्टर या दस्तावेज अहम होता है. बावजूद इसके इतनी बड़ी चूक हो गम्भीर सवाल उठाती है.
उन्होंने यह आरोप लगाया कि ऐसा लग रहा है कि विभाग या प्रशासन के लिए पुरातत्व धरोहर महत्वहीन जैसा हो चुका है. जहाँ छत्तीसगढ़ की इतिहास, परम्परा के साक्ष्यों को कबाड़ की वस्तुओं की तरह फेंक दी गई है. राजग की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण-संवर्धन की नाकामी के कारण जनता में प्रशासन के प्रति काफी रोष और आक्रोश है.
उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में राज्य सिर्फ एक स्थान पर ही खुदाई चल रही है. जबकि प्रदेश कई साइट जीर्ण अवस्था में पड़े हैं. पुरातत्व के संरक्षण का प्रयास दिख नहीं रहा है. रजिस्टर को दीमक खाने के मामले में कोई कर्रवाई नहीं हुई. पुरखौती मुक्तागन की जमीनें बांट दी जा रही है. जहाँ खुला मानव संग्रहालय बनना था, उसकी जमीनें किसी और काम से दे दी गई है. बीते 26 साल में सँस्कृति-पुरातत्व-इतिहास पर कोई शोध कार्य नहीं दिखता. पता ऐसी स्थिति में अमेरिका से मूर्ति कब वापस आ पाएगी ?
वहीं धर्मजीत सिंह ने कहा कि ताला, मल्हार, बिलासपुर, भोरमदेव में भी एक ढंग का संग्रहालय नहीं है. इन स्थानों की प्राचीन वैभव का संरक्षण नहीं हो पा रहा है.
नेता-प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने कहा कि संरक्षण का तो सरगुजा का रामगढ़ में दिख रहा है. प्राचीन नाट्य शाला ही सुरक्षित नहीं है.
इन आरोपों पर जवाब देते हुए संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि राज्य की प्राचीन धरोहरों को संरक्षित करने का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की देख-रेख लगातार जारी है.
नए संग्रहालय बनाने का प्रस्ताव भी भारत सरकार को भेजे गए हैं. भोरमदेव मंदिर में विकास और संरक्षण के लिए 150 करोड़ केंद्र सरकार की ओर से दिया गया है.
घासीदास संग्रहालय में रजिस्टर नष्ट होने के मामले में भी जिम्मेदार को नोटिस दिया गया है.
अभिलेखागार बनाने का प्रयास भी हो रहा है. मध्यप्रदेश से लाखों दस्तावेजों का डिजिटलीकरण हुआ है. वहाँ से भी अभिलेख लाया जा रहा है. आने वाले दिनों छत्तीसगढ़ के पास प्राचीन इतिहास से जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध होगी.
