विशेष आलेख: भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों की अनादि भूमि है। यहां के महापुरुषों और महान विभूतियों ने अपने जीवन, चरित्र और कर्तृत्व से समाज को दिशा, दृष्टि और जीवन के आदर्श प्रदान किए हैं। इस गौरवशाली परंपरा में महिलाओं का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। ऐसी ही एक प्रेरणादायी विभूति थीं राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका एवं आद्य प्रमुख संचालिका वंदनीय मौसीजी लक्ष्मीबाई केलकर, जिन्होंने अपने अदम्य संकल्प और संगठन शक्ति से भारतीय नारी के सामर्थ्य का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
एक सुसंस्कृत परिवार से राष्ट्रकार्य तक का सफर
वंदनीय मौसीजी का जन्म 6 जुलाई 1905 (आषाढ़ शुक्ल दशमी) को नागपुर के राम मंदिर गली में श्री भास्करराव दाते और श्रीमती यशोदाबाई दाते के सुसंस्कारित परिवार में हुआ। जन्म के समय उनकी गुलाबी, कोमल आभा से प्रभावित होकर चिकित्सक ने ही उनका नाम “कमल” रखा।
उस समय का सामाजिक वातावरण महिलाओं के लिए अत्यंत सीमित था। घर से बाहर निकलना भी कठिन माना जाता था, लेकिन कमल के बाल मन पर स्वतंत्रता आंदोलन, समाज सुधार के प्रयासों और राष्ट्रीय जागरण की घटनाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। विशेष रूप से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का अमर उद्घोष— “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा”— उनके मन में राष्ट्रसेवा की लौ प्रज्वलित कर गया।
डॉ. हेडगेवार से भेंट और एक ऐतिहासिक संकल्प
राष्ट्र और समाज के लिए कुछ करने की तीव्र इच्छा उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के पास ले गई। पहली भेंट में डॉ. हेडगेवार ने केवल उनकी जिज्ञासा को समझा, किंतु दूसरी मुलाकात में उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि महिलाओं के लिए स्वतंत्र संगठन का संपूर्ण दायित्व वे स्वयं उठाने को तैयार हों, तो वे पूरा सहयोग देंगे।
डॉ. हेडगेवार ने कहा कि ‘राष्ट्र सेविका समिति’ और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ समानांतर संगठन होंगे। जैसे रेल दो पटरियों पर चलती है, वैसे ही दोनों संगठन एक ध्येय, एक विचार और एक पद्धति के साथ राष्ट्र निर्माण में सहयोग करेंगे।
जब मौसीजी ने पूछा कि इस स्वतंत्र संगठन का दायित्व कौन संभालेगा, तो डॉ. हेडगेवार का उत्तर था— “आप संभालेंगी।” यही वह क्षण था, जिसने भारतीय महिला संगठन के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया।
राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना
वंदनीय मौसीजी ने इस दायित्व को पूरे आत्मविश्वास और समर्पण के साथ स्वीकार किया। उनके संकल्प का परिणाम था कि विजयादशमी, वर्ष 1936 को राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हुई। यह संगठन केवल महिलाओं का संगठन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति, सेवा, संस्कार और संगठन का सशक्त माध्यम बन गया।
मौसीजी का विश्वास था कि यदि नारी जागृत, संगठित और संस्कारित होगी तो समाज और राष्ट्र दोनों सशक्त होंगे। उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध कर दिया कि दृढ़ संकल्प वाली एक महिला पूरे समाज की दिशा बदल सकती है।
संकल्प दिवस की प्रेरणा
मौसीजी ने जीवन के अंतिम क्षण तक अपने संकल्प का निर्वहन किया। उनके इसी अदम्य संकल्प की स्मृति में राष्ट्र सेविका समिति प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल दशमी, उनके जन्मदिवस को ‘संकल्प दिवस’ के रूप में मनाती है। इस अवसर पर सेविकाएं राष्ट्रकार्य के लिए नए संकल्प लेकर समाज जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प दोहराती हैं।
आज भी जीवंत है मौसीजी की प्रेरणा
लगभग नौ दशक पूर्व बोया गया यह संगठनात्मक बीज आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है और राष्ट्र सेविका समिति अपने 90 वर्ष पूर्ण करने की ओर अग्रसर है। यह विस्तार मौसीजी के दूरदर्शी नेतृत्व, तप, त्याग और संगठन शक्ति का सजीव प्रमाण है।
वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर का जीवन संदेश स्पष्ट है कि संकल्प, संस्कार और संगठन के बल पर राष्ट्र निर्माण का महान कार्य संभव है। उनका जीवन आज भी असंख्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास दिलाता है कि एक दृढ़ निश्चयी महिला समाज और राष्ट्र के भविष्य को नई दिशा दे सकती है।
- डाॅ. सुलभा देशपांडे (अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका)
