दुर्ग। श्री रिद्धि सिद्धि बिल्डर्स से जुड़े बहुचर्चित भूमि विवाद को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिकायतकर्ता पक्ष ने पूरे घटनाक्रम को विस्तार से प्रस्तुत किया। प्रेस वार्ता में दावा किया गया कि वर्ष 2009 में गठित अपंजीकृत साझेदारी फर्म की संपत्ति का कथित रूप से विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना खाता विभाजन किया गया, जिसके बाद राजस्व अभिलेखों में बदलाव, भूमि विक्रय और हिस्सेदारी को लेकर विवाद खड़ा हुआ। इसी मामले में छत्तीसगढ़ राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष कांतिलाल बोथरा समेत अन्य के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 420 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज होने का भी उल्लेख किया गया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि वर्ष 2009 में दुर्ग में “श्री रिद्धि सिद्धि बिल्डर्स” नाम से एक अपंजीकृत साझेदारी फर्म बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य भूमि खरीदना, आवासीय कॉलोनी विकसित करना और रियल एस्टेट कारोबार करना था। फर्म में कांतिलाल बोथरा, सजल जैन, विश्वास गुप्ता, मनीष शर्मा, रूपेश जैन और अमृता खंडेलवाल साझेदार थे।
शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, स्वर्गीय कमलाबाई बोथरा ने अपनी निजी भूमि फर्म में पूंजी के रूप में दी थी, जिसके बदले उन्हें 10 प्रतिशत साझेदारी मिली। दावा किया गया कि यह भूमि फर्म की संपत्ति के रूप में दर्ज थी और वर्षों तक उसी आधार पर उसका लेखा-जोखा रखा गया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया गया कि वर्ष 2018-19 के दौरान फर्म के विघटन के नाम पर कुछ साझेदारों से कोरे कागजों और स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर कराए गए। बाद में इन्हीं हस्ताक्षरों का उपयोग कथित रूप से खाता विभाजन और अन्य दस्तावेज तैयार करने में किया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बाद फर्म की भूमि के एक हिस्से का छोटे-छोटे भू-खंडों में विभाजन कर कुछ साझेदारों और उनके परिजनों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराया गया तथा वर्ष 2024 में उन भू-खंडों में से कुछ की बिक्री भी कर दी गई।
शिकायतकर्ता रूपेश जैन ने दावा किया कि जब उन्हें इन घटनाओं की जानकारी मिली तो उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड, फर्म के लेखा अभिलेख, आयकर रिटर्न और अन्य दस्तावेजों का परीक्षण किया। उनके अनुसार राजस्व अभिलेख और फर्म के लेखा रिकॉर्ड में गंभीर विरोधाभास सामने आए, जिसके आधार पर उन्होंने संबंधित विभागों में शिकायतें दर्ज कराईं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकारी जांचों का हवाला देते हुए दावा किया गया कि सूचना के अधिकार के तहत मांगे जाने पर खाता विभाजन से जुड़े कई आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके। साथ ही, तत्कालीन तहसीलदार और संबंधित पटवारी के लिखित जवाबों में भी विरोधाभास सामने आने की बात कही गई।
शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, अपर कलेक्टर दुर्ग ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि बिना प्रकरण दर्ज किए, बिना सार्वजनिक इश्तहार, बिना फर्द बंटवारा और संबंधित पक्ष की अनुपस्थिति में खाता विभाजन किया गया, जो नियमानुसार नहीं पाया गया। वहीं एसडीएम जांच रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 178 एवं 178(क) के प्रावधानों के पालन नहीं होने का उल्लेख किया गया। विभागीय कार्रवाई में संबंधित अधिकारी के विरुद्ध आरोप-पत्र जारी होने का भी दावा किया गया।
प्रेस वार्ता में कहा गया कि एक ओर राजस्व रिकॉर्ड में भूमि को व्यक्तिगत हिस्सों में दर्शाया गया, जबकि दूसरी ओर उसी अवधि में फर्म के लेखा अभिलेखों में वही भूमि फर्म की संपत्ति के रूप में दर्ज रही, उसकी बिक्री फर्म के नाम से दिखाई गई और लाभ पर आयकर भी जमा किया गया। शिकायतकर्ता ने इसी आधार पर पूरे मामले में गंभीर कानूनी सवाल उठाए।
बताया गया कि विवादित भूमि की बिक्री की जानकारी मिलने के बाद वर्ष 2024 में प्रधान जिला न्यायालय, दुर्ग में घोषणा, रजिस्ट्री निरस्तीकरण, बंटवारा, कब्जा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए सिविल वाद दायर किया गया। इसके साथ ही आपराधिक कार्रवाई की मांग भी की गई। शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, सक्षम न्यायालय ने प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध की जांच आवश्यक मानते हुए एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, जिसके बाद पुलिस ने धारा 420 एवं 34 के तहत अपराध दर्ज कर विवेचना शुरू की।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया गया कि इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध मीडिया ट्रायल करना नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों, सरकारी जांच रिपोर्टों और न्यायालयीन कार्यवाहियों के आधार पर पूरे मामले के तथ्यों को सार्वजनिक करना है। साथ ही यह प्रश्न भी उठाया गया कि यदि वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो संबंधित व्यक्तियों और अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय की जाएगी।
