नई दिल्ली। माकपा (सीपीआई-एम) नेता वृंदा करात ने 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के कथित नफरती भाषणों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के 29 अप्रैल के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए समीक्षा याचिका दायर की है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोनों नेताओं के भाषणों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
समीक्षा याचिका में करात ने फैसले के उस हिस्से को चुनौती दी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि मजिस्ट्रेट को सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के लिए धारा 196 के तहत पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं है, लेकिन इसके बावजूद अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि कथित भाषणों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
वृंदा करात ने इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से इनकार करने के फैसले को बरकरार रखा गया था।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि अनुराग ठाकुर द्वारा चुनावी रैली में लगाए गए “देश के गद्दारों को, गोली मारो…” नारे और प्रवेश वर्मा द्वारा शाहीन बाग प्रदर्शनकारियों को लेकर दिए गए बयान भारतीय दंड संहिता की धाराओं 153ए, 153बी, 295ए और 505 के तहत संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं।
29 अप्रैल को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने करात की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि इन भाषणों में किसी विशेष समुदाय का उल्लेख नहीं होने के कारण नफरत फैलाने वाला अपराध नहीं बनता।
समीक्षा याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर फैसला दे दिया, जबकि न तो ट्रायल कोर्ट और न ही दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पहलू पर कोई निर्णय दिया था। करात का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई केवल इस कानूनी प्रश्न तक सीमित थी कि धारा 156(3) के तहत जांच के आदेश से पहले धारा 196 के तहत पूर्व अनुमति आवश्यक है या नहीं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है और उसका निर्णय भविष्य की कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेगा। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह निष्कर्ष दर्ज कर दिया कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
करात ने समीक्षा याचिका में चुनाव आयोग के जनवरी 2020 के आदेशों का भी हवाला दिया है, जिनमें आयोग ने दोनों नेताओं के भाषणों को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना था और उन्हें भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची से हटाते हुए चुनाव प्रचार पर रोक लगाई थी।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह अपने उस निष्कर्ष पर पुनर्विचार करे, जिसमें कहा गया था कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, और सभी पक्षों की विस्तृत सुनवाई के बाद मामले के गुण-दोष पर निर्णय दे। यह समीक्षा याचिका अधिवक्ता सिलौना महापात्रा, तारा निरुला और आदित पुजारी के माध्यम से दायर की गई है।
