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हाईकोर्ट ने SECL के टेंडर प्रक्रिया के खिलाफ याचिका की खारिज, कहा- कंपनी को शर्तों की व्याख्या का अंतिम अधिकार

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एसईसीएल के टेंडर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है. चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि टेंडर की शर्तों की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार उस विभाग या कंपनी के पास है जिसने टेंडर जारी किया है.

एसईसीएल ने कोरबा क्षेत्र की बगदेवा भूमिगत खदान के लिए नवनिर्मित स्वदेशी कंटीन्युअस माइनर मशीन के लिए ट्रायल टेंडर जारी किया था. रायपुर की कंपनी मोश वरया ने इसके लिए बोली लगाई और सैंडविक मॉडल एमसी-350 मशीन का प्रस्ताव दिया. कंपनी का दावा था कि यह मशीन पुणे में बनी है और इसमें 57.23% स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, इसलिए इसे नवनिर्मित माना जाए. एसईसीएल की टेक्निकल कमेटी ने कंपनी की बोली यह कहते हुए खारिज कर दी कि सैंडविक का यही मॉडल पहले से ही हल्दीपला खदान में काम कर रहा है. जबकि टेंडर की स्पष्ट शर्त थी कि मशीन नवनिर्मित होनी चाहिए और भारत की किसी भी खदान में पहले उपयोग नहीं की गई होनी चाहिए. सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि टेंडर जारी करने वाली अथॉरिटी प्रोजेक्ट की जरूरतों को समझने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में होती है. कोर्ट तब तक ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक कि निर्णय पूरी तरह से मनमाना या दुर्भावनापूर्ण न हो.

चैटजीपीटी के इस्तेमाल पर विवाद

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि एसईसीएल नवनिर्मित शब्द की व्याख्या के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल चैटजीपीटी की मदद ली, जो कि नियम विरुद्ध है. लेकिन हाई कोर्ट और इंडिपेंडेंट एक्सटर्नल मॉनिटर्स ने पाया कि विभाग ने प्री-बिड स्पष्टीकरण के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लिया था और एआई का उपयोग केवल सामान्य समझ के लिए किया गया था, जिससे निर्णय की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता.