“ना लिखित अनुमति, ना नियम… फिर भी सड़कें घेरते पंडाल, प्रशासन की आंख पर पट्टी, आखिर जिम्मेदार कौन?
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इन दिनों एक अलग ही विवाद में उलझी हुई है। सड़कों पर गणेश पंडाल और स्वागत द्वार लगाने को लेकर प्रशासन और जनहित याचिकाकर्ता आमने-सामने आ गए हैं। मामला पहले से ही छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL 46/2025) के तहत विचाराधीन है। 21 जुलाई 2025 को हुई सुनवाई के दौरान महाअधिवक्ता ने कोर्ट को आश्वासन दिया था कि त्योहारी सीजन में फिलहाल वर्तमान गाइडलाइंस का पालन किया जाएगा और जल्द ही नई नीति भी सामने लाई जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि नई पालिसी जल्द लाई जाए और इसी कारण अगली सुनवाई 2 सितंबर के लिए तय की गई है।
गौरतलब है कि वर्तमान नियमों के तहत गृह (पुलिस) विभाग मंत्रालय, रायपुर का आदेश दिनांक 22 अप्रैल 2022 लागू है, जिसमें किसी भी धार्मिक या सार्वजनिक आयोजन के लिए कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। यानी, सड़कों पर पंडाल लगाने के लिए लिखित अनुमति आवश्यक है।

“अघोषित अनुमति” का आरोप
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और याचिकाकर्ता डॉ. राकेश गुप्ता ने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा है कि इस साल अब तक एक भी लिखित अनुमति न तो कलेक्टर ने जारी की और न ही पुलिस अधीक्षक ने। इसके बावजूद पूरे शहर में चौक-चौराहों, संकरी गलियों और व्यस्त सड़कों पर पंडालों का कब्जा हो चुका है।
डॉ. गुप्ता का कहना है कि प्रशासन आंख मूंदे बैठा है और व्यवहारिक रूप से “अघोषित अनुमति” दे चुका है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि स्टेशन रोड और शंकर नगर जैसे अत्यधिक व्यस्त इलाकों में सड़कों को घेरकर पंडाल खड़े कर दिए गए हैं, जिससे आम जनता का जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है।
बैठक में हुआ था अप्रत्यक्ष इशारा
डॉ. गुप्ता ने यह भी खुलासा किया कि 19 अगस्त को हुई एक बैठक में प्रशासन ने अनुमति की चर्चा तो नहीं की, लेकिन यह शर्त रख दी कि हर पंडाल में सीसीटीवी कैमरा लगाना अनिवार्य रहेगा। यह व्यवस्था अपने आप में यह संकेत है कि बिना लिखित आदेश के भी पंडालों को खड़े होने की मौन स्वीकृति मिल चुकी है।याचिकाकर्ता ने कहा कि आने वाले त्योहारी सीजन में रायपुरवासियों को घंटों ट्रैफिक जाम में फंसे रहना पड़ेगा। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जिला प्रशासन अब कोर्ट के आदेशों से बेखौफ नजर आ रहा है।






