मातृभाषा और राष्ट्रीय स्वाभिमान: RSS के वैचारिक अधिष्ठान और भाषाई दृष्टि पर एक विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने सदैव मातृभाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र के स्वाभिमान और संस्कृति की संवाहिका माना है। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी (एम.एस. गोलवलकर) से लेकर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत तक, संघ का वैचारिक विमर्श भारतीय भाषाओं के संरक्षण और उनके शुद्धिकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है।
भाषा शुद्धि और ऐतिहासिक प्रेरणा: श्री गुरूजी के विचार
श्री गुरूजी का मानना था कि भाषा की शुद्धि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्वाभिमान को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि परकीय शासन और राजनैतिक संघर्षों के बीच हमने अक्सर अपनी भाषा के शुद्ध स्वरूप की उपेक्षा की, जिससे हमारा मन राष्ट्र की विशुद्ध कल्पना से दूर होता चला गया।
- शिवाजी महाराज का ‘राज्यव्यवहारकोष’: श्री गुरूजी ने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उन्होंने प्रशासनिक कार्यों से फारसी और अरबी शब्दों को हटाकर संस्कृत निष्ठ शब्दावली को अपनाने के लिए ‘राज्यव्यवहारकोष’ तैयार करवाया था।
- भाषाई परिवर्तन का सांख्यिकीय प्रमाण: मराठा इतिहासकार वि. का. राजवाडे के आंकड़ों के अनुसार, शिवाजी महाराज के प्रयासों से प्रशासनिक भाषा में मराठी/संस्कृत शब्दों का प्रतिशत 1628 में 14.4% से बढ़कर 1728 तक 93.7% हो गया था।
- वीर सावरकर का संकल्प: स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने भी मराठी भाषा को परिमार्जित करने और अनावश्यक विदेशी शब्दों को हटाने के लिए निरंतर प्रयास किए ताकि भाषा उपहास का पात्र न बने।
विविधता में एकता: भारतीय भाषाओं का इंद्रधनुष
संघ की दृष्टि में भारत की सभी भाषाएँ (तमिल, बँगला, मराठी, पंजाबी आदि) समान रूप से श्रद्धा की पात्र और ‘राष्ट्रभाषा’ हैं।
- आंतरिक एकजुटता: श्री गुरूजी के अनुसार, भारतीय भाषाएँ एक ही सूर्य की किरण से निकले इंद्रधनुष के रंगों के समान हैं। जिस प्रकार श्री रामचंद्र का व्यक्तित्व वाल्मीकि (संस्कृत), तुलसी (हिंदी) और कंब (तमिल) में समान रूप से प्रकाशित होता है, वैसे ही हमारी सभी भाषाओं का आत्मिक तत्व एक है।
- संस्कृत: महान संयोजक सूत्र: सभी भारतीय भाषाओं की जननी ‘देववाणी संस्कृत’ को संघ आज भी राष्ट्रीय एकता का सबसे प्रबल सूत्र मानता है।
डॉ. मोहन भागवत: स्वभाषा और आधुनिक चुनौतियां
वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भाषाई धरोहर के क्षय पर गहरी चिंता जताई है। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- घर से शुरुआत: डॉ. भागवत के अनुसार, अंग्रेजी माध्यम दोषपूर्ण नहीं है, बल्कि घर पर अपनी भाषा बोलने में हिचकिचाहट असली समस्या है।
- शत्रुता नहीं, गौरव का भाव: संघ अंग्रेजी से शत्रुता नहीं रखता, लेकिन देश की उन्नति के लिए मातृभाषा में शिक्षा को अनिवार्य मानता है।
- हिंदी और मन-मिलाप: हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार करते हुए वे कहते हैं कि हिंदी भाषियों को भी अन्य प्रांतों की भाषा सीखनी चाहिए ताकि राष्ट्रीय एकजुटता और “मन-मिलाप” बढ़े।
संघ के महत्वपूर्ण प्रस्ताव और सांगठनिक प्रयास
अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने समय-समय पर (1958, 1963, 1965, 2015 और 2018) भाषाई स्वावलंबन हेतु प्रस्ताव पारित किए हैं:
- शिक्षा और न्याय: संघ की मांग है कि प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य रूप से मातृभाषा में हो और उच्च शिक्षा (तकनीकी व चिकित्सा) के विकल्प भी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हों।
- न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्य: सभी शासकीय और न्यायिक कार्यों में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
आनुषंगिक संगठनों की भूमिका:
- संस्कृत भारती: संस्कृत को ‘वदतु संस्कृतम्’ अभियान के माध्यम से जनभाषा बनाने में जुटी है।
- वनवासी कल्याण आश्रम: जनजातीय बोलियों और मौखिक परंपराओं को लिखित रूप देकर संरक्षित कर रहा है।
- ABVP: तकनीकी शिक्षा को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने हेतु AICTE जैसे संस्थानों को निरंतर ज्ञापन दे रही है।
- शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास: ‘भारतीय भाषा मंच’ के माध्यम से लाखों लोगों को मातृभाषा में हस्ताक्षर करने और संवाद करने हेतु प्रेरित कर रहा है।
संघ का मानना है कि जब तक भारत अपने सामान्य और राज-व्यवहार के लिए विदेशी भाषा (अंग्रेजी) पर निर्भर रहेगा, वह पूर्णतः मानसिक दासता से मुक्त नहीं हो सकता। भारतीय भाषाओं का उत्थान ही भारत के गौरवशाली भविष्य की आधारशिला है।






