कानून से ऊपर पहचान नहीं: राष्ट्र की एकता का संवैधानिक सवाल
भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ संविधान की सर्वोच्चता और कुछ समूहों की विचारधारात्मक आक्रामकता के बीच संघर्ष अब स्पष्ट रूप में दिखने लगा है। यह समस्या किसी धर्म-विशेष के अनुयायियों की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो अपने धार्मिक या वैचारिक ग्रंथों को देश, समाज, राष्ट्र और संविधान से ऊपर रखने की घोषणा करते हैं। संविधान भारतीय नागरिकता का आधार है, और नागरिकता स्वयं तभी सार्थक होती है जब नागरिक राष्ट्रहित को सर्वोच्च मानता है। दुर्भाग्य यह है कि अब कुछ संगठित समूह खुले तौर पर घोषणा करने लगे हैं कि उनके लिए शरिया या उम्मा की निष्ठा भारतीय संविधान से पहले है। यह घोषणा केवल धार्मिक भावना नहीं—यह राष्ट्रीय ढांचे के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह है।
इस प्रकार की विचारधारा धीरे-धीरे अपराधों को वैधता देने का खतरनाक माध्यम बन जाती है। जब किसी कट्टर नेटवर्क के भीतर अपराधी मानसिकता को “कौमी कर्तव्य” कहकर समर्थन दिया जाता है, तब वह अपराध सामान्य आपराधिक हरकत नहीं रह जाता; वह संगठित सामाजिक हिंसा बन जाता है। भीड़ हिंसा, दंगे, पत्थरबाजी, आतंकवादियों के लिए खुला समर्थन, और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले आंदोलन इसी मानसिकता की उपज हैं। यदि यह वातावरण बढ़ता रहा तो अराजकता केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और भौगोलिक स्तर पर भी देश को कमजोर कर देगी। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि किसी भी राष्ट्र में जब कानून से ऊपर किसी वैचारिक पहचान को बढ़ावा मिलता है, तो राष्ट्र अंततः विघटन के मार्ग पर चल पड़ता है।
यहाँ पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसे नागरिकों के लिए समाधान क्या होना चाहिए? क्या देश से निष्कासन या फाँसी जैसे कठोर दंड की आवश्यकता है? या कोई ऐसा उपाय है जो राष्ट्र को भी सुरक्षित रखे और लोकतंत्र की मर्यादा भी बनाए रखे? यह समझना आवश्यक है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में मृत्यु-दंड या नागरिकता-निष्कासन अंतिम औज़ार हैं। इन्हें केवल तभी उपयोग किया जा सकता है जब नागरिक ने स्वयं हिंसक राष्ट्र-विरोधी अपराध किया हो—जैसे आतंकवाद, राजद्रोह की सशस्त्र गतिविधि या बड़े पैमाने पर हिंसा का नेतृत्व। केवल विचारधारात्मक बयान के आधार पर इन दंडों का इस्तेमाल करना संविधान की दृष्टि से संभव नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संवैधानिक व्यवस्था ऐसे घोषणाओं को सहन करने के लिए बाध्य है।
समाधान दंड की कठोरता में नहीं, बल्कि कानून के निर्णायक और निर्भीक प्रयोग में है। जिस नागरिक ने संविधान-विरोधी विचार को सार्वजनिक रूप से घोषित किया है, उसके लिए कानून पहले से मौजूद है—UAPA, राजद्रोह से संबंधित धाराएँ, 153A और 295A जैसी सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी धाराएँ, तथा संगठित अपराधों पर राज्यस्तरीय कठोर कानून। समस्या यह है कि इन कानूनों का प्रयोग निरंतर, निष्पक्ष और त्वरित गति से नहीं होता। जब कानून लचीला हो जाता है, तब अपराधी समूहों को यह भ्रम हो जाता है कि वे अपनी “कौमी एकता” या “धार्मिक पहचान” की आड़ लेकर किसी भी अपराध को दबा या पलट सकते हैं। यही भ्रम भविष्य में अराजकता का मूल कारण बनता है।
इसलिए राष्ट्रहित में पहला और अनिवार्य कदम यह होना चाहिए कि संविधान को अस्वीकार करने की सार्वजनिक घोषणा को गंभीर अपराध माना जाए। यह अपराध उतना ही गंभीर है जितना कि किसी सशस्त्र विद्रोह की घोषणा, क्योंकि दोनों ही राष्ट्र की संप्रभुता पर सीधा प्रहार करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को तुरंत कानून की गिरफ्त में लाया जाना चाहिए, और न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि उन्होंने हिंसा, दंगा, देश-विभाजन का उकसावा या आतंकवादी गतिविधियों का समर्थन किया है तो उनके लिए कठोरतम दंड पहले से ही उपलब्ध हैं—जो आवश्यक होने पर मृत्यु-दंड तक जा सकते हैं। लेकिन यह दंड प्रक्रिया कानून के अनुसार होनी चाहिए, किसी मजहबी (religious) पहचान के आधार पर नहीं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन का लाभ उठाकर कई कट्टर समूह भीड़ को भड़काते हैं, गरीब महिलाओं को पैसे देकर आंदोलनों में बैठाते हैं, और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए “पीड़ित अल्पसंख्यक” का नैरेटिव तैयार करते हैं। ऐसे तंत्र को तोड़ना शिक्षित समाज, स्वतंत्र न्यायपालिका और कठोर शासन—तीनों की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक यह तंत्र मजबूत रहेगा, अपराधियों को “कौमी समर्थन” मिलता रहेगा और वे राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को अपनी पहचान का हिस्सा मानकर आगे बढ़ेंगे।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र में नागरिक अनुशासन केवल कानून पालन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता और शक्ति का आधार है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान की मर्यादाओं का सम्मान करे, सार्वजनिक जीवन में सत्य, सहिष्णुता और जिम्मेदारी का पालन करे, तथा राष्ट्रहित को हर व्यक्तिगत या समूहगत पहचान से ऊपर रखे। देशभक्ति का अर्थ केवल भावनात्मक निष्ठा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में ईमानदार आचरण, कानून का सम्मान, करों का सही भुगतान, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और समाज में सद्भाव बनाए रखने की सक्रिय भागीदारी है। हमारा देश सर्वोपरि है और नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य है कि वह अपने आचरण से भारत को अधिक सुरक्षित, सशक्त और सम्मानित बनाए।
भारत को अब यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि धर्म व्यक्ति का निजी अधिकार है, लेकिन राष्ट्र और संविधान किसी भी नागरिक से ऊपर है। जो नागरिक संविधान की सर्वोच्चता को अस्वीकार करता है, वह स्वयं को उस सामाजिक अनुबंध से बाहर कर लेता है जो नागरिक होने की मूल शर्त है। कानून को ऐसे व्यक्तियों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए क्योंकि राष्ट्र को न तो अनियंत्रित भीड़तंत्र चाहिए और न ही वैचारिक अराजकता का वातावरण।
राष्ट्र तभी मजबूत रहेगा जब नागरिकता का आधार केवल एक होगा— परस्पर सुख-दुख की अनुभूति के साथ हममें अपने देश और भारतीय संविधान के प्रति अटूट सर्वोच्चता होगी।
– कैलाश चन्द्र






