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धर्म स्तंभ काउंसिल की ऐतिहासिक मांग बस्तर को मिले उसका प्राचीन नाम “दंडकारण्य’

रायपुर।  छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक चेतना, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु धर्म स्तंभ काउंसिल ने आज मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को एक विस्तृत मांग पत्र भेजते हुए बस्तर संभाग का नाम बदलकर “दंडकारण्य” किए जाने की मांग की है।

बकौल धर्म स्तंभ कौंसिल यह मांग केवल नाम परिवर्तन की नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सनातन आत्मा को पुनर्स्मरण कराने की पहल है, धर्म स्तंभ कौंसिल के सभापति डॉ. सौरभ निर्वाणी ने कहा “बस्तर कोई साधारण संभाग नहीं है,यह वह भूभाग है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने माता सीता और भैया लक्ष्मण के साथ वनवास काल में चरण रखे, ऋषियों की रक्षा की, और धर्म की स्थापना के बीज बोए,यह संपूर्ण क्षेत्र दंडकारण्य के नाम से हजारों वर्षों से स्मृत और पवित्र रहा है, परंतु औपनिवेशिक व्यवस्था में इसकी पहचान को कृत्रिम नामों में समेट दिया गया, अब समय है कि हम छत्तीसगढ़ को उसके मूल गौरव से जोड़ें।”

मांग के पीछे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार गिनाते हुए धर्म स्तंभ कौंसिल ने स्पष्ट किया कि रामायणीय प्रमाण – वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण और रामचरितमानस में “दंडकारण्य” का विस्तार वर्णित है। बस्तर की धरती पर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता ने कई ऋषियों के आश्रमों में निवास किया।

जनजातीय परंपराओं में श्रीराम की उपस्थिति – बस्तर की गोंड-मुरिया संस्कृति में आज भी श्रीराम को “बड़ेराज” (महान राजा) के रूप में पूजा जाता है। वहाँ के लोकगीत, कथाएँ, चित्रकलाएँ श्रीराम के वनवास काल की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।

दंडकारण्य विकास प्राधिकरण (DDA) भारत सरकार ने 1947 के बाद बंगाल से आए विस्थापितों के पुनर्वास के लिए इसी क्षेत्र में “दंडकारण्य” नाम से आधिकारिक योजना बनाई, जो दर्शाता है कि यह नाम केवल धार्मिक नहीं, प्रशासनिक स्वीकृति भी प्राप्त था.

नर्मदा कुंड निर्वाणी अखाड़ा रामजानकी मंदिर के महंत सुरेंद्र दास ने कहा यह धर्म और नैतिक चेतना का पुनर्जागरण का काल है
“दंडकारण्य केवल एक वन क्षेत्र नहीं है। यह धर्म और अधर्म के संघर्ष का मैदान था। यही वह भूमि है जहाँ भगवान राम ने राक्षसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध शस्त्र उठाया और ‘मर्यादा’ की स्थापना की।”

बस्तर नाम एक औपनिवेशिक प्रतीक है, जबकि दंडकारण्य सनातन संस्कृति और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वनगमन की स्मृति को जीवंत करता है

“दंड” का अर्थ है अनुशासन, और दंडकारण्य वह भूमि है जहाँ भगवान श्रीराम ने राक्षसी प्रवृत्तियों का अंत कर धर्म की पुनर्स्थापना की,यह नाम राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक सुधार का प्रतीक बनेगा।

इस मांग को अखाड़ा परिषद, निर्वाणी अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय वैष्णव ब्राह्मण सेवा संघ, और प्रदेशभर के संत-महंतों का व्यापक समर्थन प्राप्त है। प्रमुख संतजनों में महंत नरेंद्र दास राष्ट्रीय सचिव संत परिषद निर्मोही अखाड़ा ,दिगंबर अखाड़ा ,
महंत हेमंत दास चित्रकूट ,महंत नंदकिशोर दास,संत पंचराम दास
डॉ. रविन्द्र द्विवेदी,राघवेंद्र दास आदि प्रमुख हैं।

धर्म स्तंभ काउंसिल के डॉ रवीन्द्र द्विवेदी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अभियान केवल एक नामकरण नहीं, बल्कि “छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पुनर्रचना” का आरंभ है।

इसके आगामी योजना को बताते हुए कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मिलकर औपचारिक अनुरोध के पश्चात संत समाज की बैठक एवं जन समर्थन हस्ताक्षर अभियान, “दंडकारण्य पुनर्जागरण यात्रा” का आयोजन बस्तर के ग्रामों में सांस्कृतिक संवाद किया जाएगा वहीं विधान सभा में नाम परिवर्तन प्रस्ताव हेतु विधायक प्रतिनिधिमंडल से भेंट के अलावा नेता प्रतिपक्ष और विपक्षी दलों के विधायक सांसदों से भी मिलकर उन्हें समर्थन के लिए कहेंगे।

धर्म स्तंभ काउंसिल के राघवेंद्र दास ने प्रदेश के समस्त सनातन अनुयायियों, मठ-मंदिर संस्थानों, और संस्कृति प्रेमियों से इस पुनीत कार्य में सहयोग का आह्वान किया है।