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March 9, 2026

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वेतन वसूली के आदेश पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता बोझ

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तकनीकी शिक्षा विभाग के एक आदेश को खारिज करते हुए एक कर्मचारी को बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा कि 16 साल बाद की जाने वाली वेतन वसूली पूरी तरह अनुचित और अन्यायपूर्ण है। न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि यदि विभागीय गलती से अधिक वेतन दिया गया है तो उसका बोझ कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता।

मामला एक सरकारी सेवक से जुड़ा है, जो 1996 में तकनीकी शिक्षा विभाग में व्याख्याता बना और बाद में प्राचार्य पद तक पहुँचा। विभाग ने 21 दिसंबर 2022 को आदेश जारी कर यह कहते हुए वसूली शुरू कर दी थी कि 2006 के बाद से उसे अधिक वेतन मिला है। जबकि वेतन निर्धारण पूरी तरह विभागीय अधिकारियों के आदेश से हुआ था और इसमें कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं थी। याचिकाकर्ता के वकील मतीन सिद्दीकी और दीक्षा गौराहा ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह (2015) फैसले के अनुसार, यदि अतिरिक्त भुगतान कर्मचारी की धोखाधड़ी या गलत सूचना देने से नहीं हुआ है तो वसूली नहीं की जा सकती। इस सिद्धांत की पुष्टि बाद में थॉमस डेनियल (2022) और जोगेश्वर साहू (2023) मामलों में भी हुई है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड में कहीं भी ऐसा नहीं है कि कर्मचारी ने विभाग को गुमराह किया हो। वह केवल वही वेतन लेता रहा जो विभाग ने खुद तय किया था। अदालत ने माना कि इतने लंबे समय बाद वसूली करना न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि कर्मचारी पर असहनीय आर्थिक बोझ डालने जैसा है। अदालत ने 21 दिसंबर 2022 का आदेश निरस्त कर वसूली पर रोक लगा दी। साथ ही कहा कि यदि पहले से कोई राशि वसूल की गई है तो तीन महीने के भीतर लौटाई जाए। हालांकि, अदालत ने विभाग को यह स्वतंत्रता भी दी कि भविष्य में नियमों के अनुसार वेतन संशोधन किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कर्मचारी को सुनवाई का अवसर देना होगा।