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छत्तीसगढ़ कैबिनेट विस्तार पर हाईकोर्ट में सुनवाई, याचिकाकर्ता को दिया गया दो सप्ताह का समय

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार और 14वें मंत्री के शपथ ग्रहण को लेकर हाईकोर्ट में दाखिल याचिका पर आज अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में लंबित प्रकरण की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।

कोर्ट में हुई बहस

सुनवाई के दौरान सबसे पहले याचिकाकर्ता का शपथ पत्र स्वीकार किया गया। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि इसी तरह का एक मामला वर्ष 2020 से सुप्रीम कोर्ट में एन.पी. प्रजापति बनाम राज्य सरकार शीर्षक से लंबित है। ऐसे में जब तक वहां निर्णय नहीं होता, इस याचिका पर सुनवाई संभव नहीं है।

याचिकाकर्ता के वकील किशोर भादुड़ी ने इस पर तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट का प्रकरण पहले ही निराकृत हो चुका है। इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट केस की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया।

कैबिनेट विस्तार का विवाद

गौरतलब है कि अब तक छत्तीसगढ़ में 15 प्रतिशत सीलिंग नियम लागू होने के बाद मुख्यमंत्री को छोड़कर 12 मंत्रियों का प्रावधान रहा है। यही स्थिति डॉ. रमन सिंह और भूपेश बघेल की सरकारों में भी रही।

हाल ही में 20 अगस्त को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में हरियाणा फार्मूला लागू करते हुए 3 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई। इसके बाद मुख्यमंत्री को छोड़कर मंत्रियों की संख्या बढ़कर 13 हो गई।

याचिकाकर्ता वासु चक्रवर्ती ने इसे चुनौती दी है। उनका कहना है कि 90 सदस्यीय विधानसभा में 15 प्रतिशत की सीमा 13.5 होती है, जिसका मतलब है कि मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 13 मंत्री ही हो सकते हैं। ऐसे में 14वां मंत्री बनाना संविधान के अनुच्छेद 164(1A) का उल्लंघन होगा।

हरियाणा का उदाहरण

दिलचस्प बात यह है कि हरियाणा विधानसभा की सदस्य संख्या भी 90 है, जहां मुख्यमंत्री सहित 14 मंत्रियों का मंत्रिमंडल कार्यरत है। इसी आधार पर छत्तीसगढ़ की पिछली कांग्रेस सरकार में भी 14वां मंत्री बनाए जाने की मांग उठी थी। उस समय वरिष्ठ विधायक अमितेष शुक्ल ने यह मांग रखी थी, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे लागू नहीं किया था।

अब देखना होगा कि हाईकोर्ट में प्रस्तुत की जाने वाली सुप्रीम कोर्ट की स्टेटस रिपोर्ट इस संवैधानिक विवाद को किस दिशा में ले जाती है।