नक्सल उन्मूलन के सरकारी दावों पर सवाल, आंदोलनकारियों ने उठाए चार बड़े प्रश्न
रायपुर। छत्तीसगढ़ के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हुए राज्य के आंदोलनकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नक्सल समस्या के समाधान को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के दावों पर संदेह जताया है। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि शोषित और पीड़ित आदिवासी समाज की रही है, जिस पर वर्षों से भ्रष्ट अधिकारियों, कुछ राजनीतिक नेताओं, व्यापारी वर्ग और प्रभावशाली समूहों का वर्चस्व रहा है। परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार राज्य की पहचान बन गया और संवैधानिक अधिकारों के हनन के आरोप लगातार बढ़ते रहे।
आरोप है कि शासकीय भूमि, आबादी भूमि, आदिवासी भूमि और केंद्र सरकार की भूमि तक को भ्रष्ट अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों के गठजोड़ ने व्यवस्थित रूप से हड़पा, जिससे बाहरी व्यक्तियों को अनुचित लाभ हुआ। इसी पृष्ठभूमि में नक्सली विचारधारा को बस्तर, राजनांदगांव, कवर्धा और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में फैलने का अवसर मिला।
केन्द्र के गृहमंत्री अमित शाह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने दावा किया है कि नए वर्ष की शुरुआत में नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन संभव है। आंदोलनकारी इसे “सस्ती लोकप्रियता” बताते हुए कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि 1988 में जारी राज्य आंदोलनकारियों के घोषणा पत्र में नक्सली समस्या के समाधान के लिए स्पष्ट रणनीति सुझाई गई थी—जिसमें आदिवासी अधिकारों की रक्षा, भ्रष्ट तंत्र पर रोक, स्थानीय युवाओं को सुरक्षा बलों व प्रशासन में प्राथमिकता, और आर्थिक-सामाजिक विकास को प्राथमिकता में शामिल किया गया था।
आंदोलनकारियों ने सरकार से चार प्रमुख प्रश्न उठाए हैं:
1. आधुनिक हथियारों की सप्लाई कौन रोक रहा है?
उनका कहना है कि नक्सलियों को आधुनिक हथियार कैसे मिलते हैं, यह अब तक स्पष्ट नहीं है। यदि सप्लाई चेन नहीं रोकी गई, तो नये नक्सली फिर से हथियारबंद होकर उभर सकते हैं और करोड़ों रुपये के खर्च के बावजूद समस्या समाप्त नहीं होगी।
2. नक्सलियों के वित्तीय नेटवर्क पर अंकुश क्यों नहीं?
आरोप है कि नक्सलियों का वार्षिक “बजट” सैकड़ों करोड़ रुपये का है, जिसे भ्रष्ट अधिकारियों, उद्योगपतियों और नेताओं से समर्थन मिलता रहा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इस वित्तीय व्यवस्था पर कोई ठोस कार्ययोजना सरकार ने प्रस्तुत नहीं की।
3. शहरी नेटवर्क की रसद व्यवस्था पर कार्रवाई का अभाव
बस्तर के जंगलों में सक्रिय नक्सली समूहों को आवश्यक सामग्री शहरों में सक्रिय समर्थकों के जरिये मिलती है। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार अब तक यह नहीं बता पाई कि इस शहरी नेटवर्क को पूरी तरह बंद कर दिया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि नक्सल उन्मूलन की समय-सीमा तय करने से पूर्व गृहमंत्री और मुख्यमंत्री से सख्त जवाबदेही तय कराएं।
4. महेंद्र कर्मा सहित बड़ी घटनाओं की जांच लटकी
माओवादी हमलों में शहीद महेंद्र कर्मा एवं अन्य लोगों की मौत के मामलों में अब तक न्यायिक जांच का अंतिम निर्णय नहीं आया है। आंदोलनकारियों ने इसे “नक्सल उन्मूलन के नाम पर जनता को भ्रमित करना” बताया है।
आंदोलनकारियों ने यह भी चेतावनी दी है कि बस्तर में बड़े उद्योग स्थापित होने की स्थिति में प्राकृतिक संसाधनों, वन संपदा, वन्यजीवों और आदिवासी जीवन पर गंभीर खतरा उत्पन्न होगा। उनका कहना है कि यदि सरकार 1988 के घोषणा पत्र में सुझाई गई रणनीति अपनाती है, तभी बस्तर का संरक्षण और वास्तविक नक्सल उन्मूलन संभव है। उन्होंने अंत में कहा कि भ्रष्टाचार और शोषण को खत्म किए बिना नक्सल समस्या का समाधान केवल घोषणा भर बनकर रह जाएगा।






