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Shiv Mar 13, 2026 3 min read

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March 13, 2026

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11 साल बाद मिला इंसाफ: बेटे और उसके दोस्त की मौत के बाद पिता ने लड़ी लंबी कानूनी लड़ाई, हाई कोर्ट ने हत्यारों को सुनाई आजीवन कारावास की सजा

बिलासपुर। जवान बेटे और उसके दोस्त के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे एक पिता को 11 साल बाद हाई कोर्ट से इंसाफ मिला है। हाई कोर्ट ने राजधानी में साल 2011 में हुए इस दोहरे हत्याकांड के मामले में सुनवाई करते हुए चार में से दो आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इस मामले में पहले सत्र न्यायालय ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ मृतक मनोज मिश्रा के पिता ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। मामले की सुनवाई जस्टिस गौतम भादुरी और जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डिविजन बेंच में हुई।

बता दें कि यह घटना 2 जनवरी 2011 की है। पचपेड़ी नाका पुलिस देर रात लागविन बार के सामने दो गुटों में झड़प की सूचना मिली थी, इसके बाद आरक्षक राजू निर्मलकर मौके पहुंचे। इस दौरान उन्होंने देखा कि मनोज मिश्रा गंभीर रूप से घायल अवस्था में सड़क पर पड़े हुए है। वहीं उनके दोस्त कीर्ति चौबे का शव कुछ ही दूरी पर स्थित लक्ष्मी मेडिकल के पास पड़ा मिला था। पुलिस आनन फानन में घायल मनोज को ले गई जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।

पुलिस जांच में सामने आया कि ऑटो चालक संघ के अनिल देवांगन, राजेश मित्रा, दुर्गेश देवांगन और राजकुमार सेन के साथ सवारी उठाने को लेकर विवाद हुआ था, जिसके बाद आरोपियों ने बेसबॉल और चाकू से हमला किया था। पुलिस ने वारदात के अगले दिन आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके पास से खून से सना बेसबॉल, चाकू और अन्य हथियार बरामद किए थे।

ट्रायल कोर्ट ने किया था बरी

मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट में पर्याप्त चश्मदीद गवाहों की कमी के कारण सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था। लेकिन मृतक मनोज के पिता प्रभाशंकर मिश्रा ने हाई कोर्ट में अपील की, जहां सुनवाई के दौरान गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने अनिल देवांगन और राजेश मित्रा को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। हाई कोर्ट ने एफएसएल रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शी अजय के बयानों को आधार मानते हुए यह फैसला सुनाया।

हालांकि, सबूतों के अभाव में दुर्गेश देवांगन और राजकुमार सेन को बरी करने के सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा गया है। कोर्ट ने दोषी अनिल देवांगन और राजेश मित्रा को धारा 302 के तहत आजीवन कारावास और 1000 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाते हुए तुरंत सरेंडर करने का आदेश दिया है।