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March 9, 2026

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बच्चों में धार्मिक जीवन की शुरुवात का प्रतीक है अभिषेक शांति धारा संस्कार :– आर्यिका रत्न 105 अंतर्मति माता

रायपुर। राजधानी के लाभांडी स्थित श्री 1008 पद्मप्रभ दिगम्बर जैन मंदिर में पावन वर्ष योग 2025 चतुर्मास का आयोजन किया गया है। इस चातुर्मास में आर्यिका रत्न 105 अंतर्मति माता जी संसंघ विराजमान है। चातुर्मास में प्रत्येक दिन नियमित रूप से पूजन अभिषेक,धार्मिक क्रियाएं, संस्कार, प्रवचन, कक्षाएं आदि जारी है। आज जैन समाज के वरिष्ठ सम्माननीय सदस्य अजय जैन के पुत्र चि मोक्ष ने आज 8 वर्ष पूर्ण पर श्री जी (अरिहंत भगवान) का अभिषेक किया। विदित हो कि जैन धर्म के अनुसार किसी भी बालक के 8 वर्ष पूर्ण होने में उसे श्री जी के अभिषेक शांति धारा की पात्रता मिलती है। अजय जैन ने बताया कि प्रथम बार अभिषेक कर चि. मोक्ष ने अपने जन्मदिवस सार्थक किया।

चातुर्मास के दौरान आर्यिका रत्न 105 अंतर्मति माता जी ने बच्चों में संस्कार के लिए प्रवचन में बताया कि :–

प्रवचन और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से बच्चों में नैतिक और धार्मिक संस्कार विकसित किए जा सकते हैं। चातुर्मास, जो कि चार महीनों की अवधि है, धार्मिक गतिविधियों और आत्म-सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान, प्रवचन, धार्मिक कथाएँ, और विभिन्न अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जो बच्चों को धार्मिक और नैतिक मूल्यों को समझने और अपनाने में मदद करते हैं।

जैन धर्म में, 8 वर्ष की आयु में अभिषेक शांतिधारा करना एक महत्वपूर्ण संस्कार है, जो बालक को धार्मिक जीवन में प्रवेश करने की शुरुआत का प्रतीक है। यह जिसमें तीर्थंकर की मूर्ति पर शुद्ध जल चढ़ाया जाता है, जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इस संस्कार के माध्यम से, बच्चे को धार्मिकता और नैतिकता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया जाता है।
8 वर्ष की आयु में अभिषेक शांतिधारा करने के कुछ मुख्य कारण हैं:–
• धार्मिक संस्कार: यह एक धार्मिक संस्कार है जो बच्चे को जैन धर्म के सिद्धांतों और मूल्यों से परिचित कराता है।
• पवित्रता का प्रतीक: अभिषेक शांतिधारा में, शुद्ध जल चढ़ाया जाता है, जो पवित्रता का प्रतीक है। यह बच्चे को शुद्ध और पवित्र जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है।
• धार्मिकता की शुरुआत: यह संस्कार बच्चे के धार्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक है, और उसे धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करता है।
• नैतिकता का विकास: यह संस्कार बच्चे में नैतिकता, अहिंसा, और सम्यक आचरण जैसे मूल्यों को विकसित करने में मदद करता है।
• सामाजिक बंधन: यह संस्कार परिवार और समुदाय के बीच धार्मिक बंधन को मजबूत करता है, और बच्चे को सामाजिक रूप से जिम्मेदार बनने के लिए प्रोत्साहित करता है।

संक्षेप में, 8 वर्ष की आयु में अभिषेक शांतिधारा जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण संस्कार है जो बच्चे को धार्मिक, नैतिक, और सामाजिक रूप से विकसित होने में मदद करता है।